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Best Essay On Ganesh Chaturthi In Hindi - 2018

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Essay on Ganesh Chaturthi Festival in Hindi Language: गणेश चतुर्थी हिन्दू धर्म का एक बहुत प्रिय पर्व है। ये उत्सव पूरे भारत में बेहद भक्तिभाव और खुशी से मनाया जाता है। सामान्यत: विद्यार्थीयों को किसी हिन्दू उत्सव या गणेश चतुर्थी पर्व के विशिष्ट प्रकरण पर निबंध लिखने को दिया जाता है। इसलिये यहाँ हम आपके बच्चों लिये आसान शब्दों में गणेश चतुर्थी पर निबंध उपलब्ध करा रहे है।
भूमिका : भगवान गणेश , माता पारवती और भगवान शिवजी के पुत्र हैं। गणेश चतुर्थी पर गणेश , शिवजी और पारवती जी की पूजा बड़ी ही धूमधाम से की जाती है। भारत में गणेश चतुर्थी को बहुत ही धूमधाम से मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का त्यौहार कार्यालय हो या स्कूल-कॉलेज हर जगह पर मनाया जाता है।
इस दिन सभी कार्यालयों और शिक्षा संस्थानों को बंद करके भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है। बहुत से लोग घरों में श्री गणेश जी की पूजा करते हैं। इस दिन पर सभी भक्त गणेश जी की आरती गाते हैं और भगवान को भोग के रूप में मोदक चढाते हैं। मोदक गणेश जी की बहुत ही पसंदीदा मिठाई है।

इस दिन को सबसे भव्य और बड़े तौर पर भारत के महाराष्ट्र राज्य में मनाया जाता है। महाराष्ट्र में इस त्यौहार को इसलिए धूमधाम से मनाया जाता है क्योंकि बहुत सालों पहले छत्रपति शिवाजी महाराज ने इसकी शुरुआत की थी। गणेश चतुर्थी को सबसे अधिक और जबर्दस्त तरीके से महाराष्ट्र और भारत के सभी हिन्दुओं में मनाया जाता है।

गणेश जी के नाम : 
गणेश जी के मुख्य रूप से 12 नाम हैं। उनके 12 नामों का वर्णन नारद पुराण में मिलता है। गणेश जी को मुख्य रूप से सुमुख , एकदंत , कपिल , गजकर्ण , लंबोदर , विकट , विघ्न-नाशक , विनायक , धूम्रकेतु , गणाध्यक्ष , भालचंद्र , गजानन आदि नामों से भी पुकारा जाता है।

गणेश जी की पूजाविधि : सुबह-सुबह सबसे पहले नहा-धोकर लाल वस्र पहने जाते हैं क्योंकि लाल वस्त्र भगवान गणेश जी को अधिक प्रिय लगते हैं। पूजा के दौरान श्री गणेश जी का मुख उत्तर या पूर्व की दिशा में रखा जाता है। सबसे पहले पंचामृत से गणेश जी का अभिषेक किया जाता है।

पंचामृत में सबसे पहले दूध से गणेश जी का अभिषेक किया जाता है उसके बाद दही से , फिर घी से , शहद से और अंत में गंगा जल से अभिषेक किया जाता है। गणेश जी पर रोली और कलावा चढाया जाता है। सिंदूर गणेश जी को बहुत अधिक प्रिय होता है इसलिए उनको सिंदूर चढाया जाता है।

रिद्धि-सिद्धि के रूप में दो सुपारी और पान चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद फल , पीला कनेर और दूब फूल चढाया जाता है। उसके बाद उनकी मनपसन्द मिठाई मोदक को भोग स्वरूप चढाया जाता है। भोग चढ़ने के बाद सभी परिवारजनों द्वारा मिलकर गणेश जी की आरती गाई जाती है। श्री गणेश जी के 12 नामों का और उनके मंत्रों का उच्चारण किया जाता है।

पौराणिक कथा : माता पारवती भगवान शिवजी की धर्म पत्नी थीं। माता पारवती ने अपने शरीर के मैल को उतारकर एक पुतला बनाया जिसमें उन्होंने प्राण डाल दिए और उससे एक पुत्र को उत्पन्न किया जिनका नाम गणेश रखा गया। एक बार जब माता पारवती स्नान करने गईं थीं तो उन्होंने जाने से पहले अपने पुत्र गणेश को कहा कि जब तक मैं स्नान करके न लौटूं तब तक स्नान घर के अंदर किसी को भी आने मत देना।

वह बालक द्वार पर पहरेदारी करने लगता है। थोड़ी देर बाद शिवजी वहाँ पर पहुंचे थे। गणेश जी को इस बात का पता नहीं था कि शिवजी उनके पिता हैं। गणेश जी ने शिवजी को अंदर जाने से रोका। शिवजी ने गणेश जी को बहुत समझाया लेकिन गणेश जी ने उनकी बात नहीं मानी। क्रोध में आकर शिवजी ने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर धड से अलग कर दिया।

गणेश जी की दर्द भरी आवाज को सुनकर माता पारवती बाहर आईं तो अपने पुत्र के मृत शरीर को देखकर दुःख से रोने लगीं। क्रोध में आकर माता पारवती जी ने शिवजी को अपने पुत्र को जीवित करने के लिए कह दिया। शिवजी को अपनी गलती का एहसास हुआ लेकिन वे उस अलग किए हुए सिर को वापस नहीं जोड़ सकते थे इसलिए उन्होंने नंदी को आदेश दिया कि धरती पर जिस बच्चे की माँ बच्चे की तरफ पीठ करके सो रही हो उसका सिर काटकर ले आना।

उनको सबसे पहले एक हाथी का बच्चा दिखा जिसकी माँ उसकी तरफ पीठ करके सो रही थी वे उसका सिर काटकर शिवजी के पास ले गए। शिवजी ने अपनी शक्ति के बल पर हाथी के सिर को धड से जोडकर गणेश जी को जीवित कर दिया। उस बच्चे को सभी गणों का स्वामी घोषित कर दिया जाता है तभी से उनका नाम गणपति रख दिया जाता है। तब सभी देवताओं के द्वारा गणेश जी को आशीर्वाद दिया जाता है।

सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है : शिवजी ने गणेश जी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि जब भी पृथ्वी पर किसी भी नए और अच्छे कार्य की शुरुआत की जाएगी तो वहाँ पर सबसे पहले गणेश जी का नाम लिया जायेगा और गणेश जी की आराधना करने वाले व्यक्ति के सभी दुःख दूर हो जाएंगे। इसी वजह से हम भारतीय जब कुछ भी अच्छा और नया शुरू करने जैसे – विवाह , नए व्यापर की शुरुआत , नया घर प्रवेश , शिशु के पहली बार स्कूल जाने से पहले गणेश जी की पूजा करते हैं। पूजा करते समय सुख-शांति की कामना करते हैं।

गणेश चतुर्थी को मनाने का तरीका : इस दिन को भगवान गणेश जी के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। यह भारत देश के सभी त्यौहारों में सबसे बड़ा त्यौहार माना जाता है। भारत देश में इस त्यौहार को भाद्रपद माह में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। इस त्यौहार को पूरे 11 दिनों तक मनाया जाता है जिसे पूरा भारत हर्षोल्लास के साथ मनाता है।

गणेश चतुर्थी के दिन बाजारों में बहुत चहल-पहल रहती है। इस दिन बाजारों में श्री गणेश जी की सुंदर मूर्तियाँ और उनके चित्र बिकते हैं। मिट्टी से बनाई गईं श्री गणेश जी की मूर्तियाँ बहुत ही भव्य लगती हैं। सभी लोग गणेश भगवान जी की मूर्ति को अपने-अपने घरों में उचित स्थान पर स्थापित करते हैं।

जिस समय से भगवान गणेश घर में पधारते हैं उसी समय से सारे घर का माहौल भक्तिमय हो जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन सभी भक्त अपने घरों , दफ्तरों या शैक्षिक संस्थानों में गणेश जी की मूर्ति को सजाते हैं उस दिन वहाँ पर गणेश जी की आरती और मन्त्रों के उच्चारण के साथ-साथ उनकी पूजा भी की जाती है।

लोग गणेश जी की पूजा में लाल चन्दन , कपूर , नारियल , गुड , दूर्वा घांस , और उनकी मन पसंद मिठाई का एक विशेष स्थान होता है। लोग भगवान से सुख-शांति की कामना करते हैं और साथ में ज्ञान का दान भी मांगते हैं। पूजा होने के बाद सभी लोगों को प्रसाद दिया जाता है। घरों में पकवान और मिठाईयां बनाई जाती हैं और श्री गणेश जी को भोग स्वरूप चढाई जाती हैं।

रोज लोग मंत्रों का उच्चारण करते हैं और गणेश जी की आरती गाकर गणेश जी की पूजा करते हैं और अपने सभी दुखों को हरने की कामना करते हैं। गणेश चतुर्थी के अवसर पर जगह-जगह पर गणेश पूजा के लिए लोग पंडाल भी लगाते हैं। पुरे पंडाल को फूलों से सजाया जाता है। और गणेश जी की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार गणेश जी की प्रतिदिन पूजा की जाती है।

उस दिन के बाद दस दिनों तक मूर्ति को वहीं पर रखा जाता है। लोग रोज भगवान के दर्शन के लिए वहाँ पर आते हैं और पूजा भी करते हैं। दस दिनों के बाद गणेश जी की मूर्ति को समुद्र या नदियों में विसर्जित कर दिया जाता है। पुरे धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ भगवान गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन किया जाता है। इस प्रकार से श्रीगणेश जी की पूजा संपन्न होती है। श्री गणेश भगवान की पूजा के बिना हर पूजा को अधुरा माना जाता है।

चाँद को देखना अशुभ क्यों होता है : गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा को देखना अशुभ माना जाता है। इसके पीछे भी एक कथा जुडी हुई है इसकी कथा के अनुसार एक बार चन्द्रमा ने भगवान गणेश जी के मोटे पेट पर मजाक उड़ाया था जिस पर क्रोधित होकर गणेश जी ने चन्द्रमा को श्राप दे दिया था।

जिसके परिणाम स्वरूप चन्द्रमा काला पड़ गया और जो भी चन्द्रमा को देखेगा उस पर चोरी का आरोप लगेगा। इस बात को सुनकर चन्द्रमा भयभीत हो गया और गणेश जी से श्राप से मुक्ति के लिए आराधना करने लगा। गणेश जी चन्द्रमा की आराधना से खुश हो गए और उन्होंने चन्द्रमा को श्राप से मुक्त कर दिया सिवाय भादवा मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन के। इसी लिए ऐसा माना जाता है कि इस दिन जो भी चाँद को देखता है वह कलंक का भागीदारी बनता है।

मूषक वाहन कैसे बने : महामेरु पर्वत पर एक ऋषि रहता था। उस पर्वत पर उसका आश्रम था। उसकी पत्नी अत्यंत सुंदर थी। एक दिन ऋषि लकड़ियाँ लाने के लिए वन में गए हुए थे उस समय वहाँ पर क्रोंच नामक गंधर्व आ पहुंचा था। गंधर्व ऋषि की पत्नी को देखकर व्याकुल हो उठा और उसने ऋषि की पत्नी का हाथ पकड़ लिया उसी समय वहाँ पर ऋषि भी आ गए।

गंधर्व की इस दुष्टता को देखते हुए ऋषि ने उसे श्राप दे दिया। गंधर्व को जब अपनी गलती का एहसास हुआ तो वह ऋषि से रहम की वेदना करने लगा और अपने श्राप को वापस लेने की विनती की। ऋषि ने उनकी इस दशा पर उनसे कहा कि मैं अपने श्राप को वापस तो नहीं ले सकता हूँ लेकिन धरती पर मूषक बनकर श्राप भुगतने में ही तुम्हारी भलाई है। द्वापर युग में पराशर ऋषि के आश्रम भगवान गणपति गजनंद के रूप में अवतार लेगें तुम उनके वहन बनोगे और हमेशा ही सम्मानित किए जाओगे।

उपसंहार : गणेश चतुर्थी के दिन गणेश भगवान को अपने घर में प्रवेश कराकर घर की सभी समस्याओं और कष्टों को दूर किया जाता है। गणेश चतुर्थी महाराष्ट्र राज्य के लोगों का सबसे अधिक पसंदीदा और प्रमुख त्यौहार होता है। यह दिन बहुत ही पवित्र होता है इस लिए इस त्यौहार को बड़े-बड़े अभिनेताओं द्वारा भी मनाया जाता है।

उनके व्यक्तित्व में हाथी के गुणों की प्रतिष्ठा की गई है। हाथी में बुद्धि , बल और धैर्य होता है इसलिए गणेशजी की पूजा बल , बुद्धि और धैर्य से संपन्न देवता की पूजा होती है। गणेश चतुर्थी के शुभ अवसर पर हमें उनसे इन्हीं गुणों को धारण करना चाहिए।

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