Friday, 31 May 2019

चूहे और शेर की दोस्ती Stories For Kids In Hindi {*New Story*}

चूहे और शेर की दोस्ती Stories For Kids In Hindi {*New Story*}

 चूहे और शेर की दोस्ती Stories For Kids In Hindi {*New Story*}
Friday, 31 May 2019
घने जंगल में भूख से पीड़ित एक चूहा मारा-मारा फिर रहा था। कितनी हंसी आती है यह सुन कर कि चूहे के पेट में भी चूहे दौड़ रहे थे।
तभी उसे एक गुफा की तरफ से मांस की गंध आयी। बस फिर क्या था, लपककर गुफा में पहुँच गया।
वहां पहुंचने पर उसने देखा कि मांस के बहुत से छोटे-छोटे टुकड़े जमीन पर बिखरे पड़े थे। भूख बहुत जोरो से लगी थी सो पलक झपकते ही सारे मांस के टुकड़े चट कर गया। इतना खाने के बाद नींद आना स्वाभाविक था। बस लम्बी सी डकार ले वहीँ कोने में सो गया।

 चूहे और शेर की दोस्ती
अभी वो सो रहा था कि अचानक शिकार से लौटा गुफा का मालिक शेर आ पहुँचा। घुसते ही शेर ने देखा कि गुफा कुछ बदली सी लग रही है। इतनी साफ़ और न ही कोई दुर्गन्ध। मगर इन सबको भूल वो अपने पंजों में फंसे शिकार को खाने लग गया।
शिकार को पूरा खाने के बाद देखा कि छोटे-छोटे मांस के टुकड़े इधर-उधर जमीन पर फैल गए थे। पर क्या कर सकता था। पेट भर खाने के बाद शेर की आंखें भी बोझिल होने लगी और वो सो गया।
कुछ देर बाद चूहे की नींद टूटी तो उसकी नज़र चारों तरफ फैले मांस के और टुकड़ों पर पड़ी। लपकर उसने उन सबको भी खा लिया। अभी खाया ही था कि उसकी नजर गुफा के बीचो बीच सोये शेर पर गयी। बस फिर क्या था, शेर को देखते ही चूहा कांपने लगा। सोचा, अगर शेर ने पकड़ लिया तो उसे भी खा जाएगा। जान बचाने के लिए वहां से भागने ही वाला था कि शेर जाग गया।

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शेर ने चूहे को भागते देख उसे पकड़ लिया। अब चूहा गिड़गिड़ाने लगा ” मैं तो मांस की गंध पाकर इधर चला आया था। मुझे पता होता कि यह जंगल के राजा की गुफा है तो मैं कभी इतनी हिम्मत न करता। मुझ गरीब को छोड़ दो।” और चूहा जोर जोर से रोने लगा।
शेर ने भी सोचा कि इस चूहे को खा कर तो मेरे दांत भी गीले न होंगे। पर तभी उसे एहसास हुआ कि गुफा में इतनी सफाई इसी चूहे की वजह से हुई है। शेर समझ गया कि जो मांस के टुकड़े उसके खाते हुए इधर-उधर गिर जाते हैं उन्हें ही खाकर चूहे ने अपना पेट भरा होगा।
तुरंत उसने चूहे को छोड़ कहा ” देखो, मैं तुम्हे नहीं खाऊँगा। तुम अगर चाहो तो मेरे मित्र बनकर यहाँ रह सकते हो।” ये सुन चूहे को यकीन ही न हुआ।
तब शेर ने उसे समझाया ” मैं शिकार कर के लाता हूँ और फिर गुफा में बैठ कर खाता हुँ। अक्सर खाते हुए मांस के छोटे-छोटे टुकड़े यहाँ वहां गिर जाते हैं। और फिर कुछ देर बाद उनसे दुर्गन्ध आने लगती है। तुम आराम से यहाँ रहो और अपना पेट भरो और बदले में गुफा साफ़ हो जाया करेगी।”
और इस तरह एक दुसरे का दोस्त बन चूहा और शेर एक ही गुफा में रहने लग गए।

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                                    दादी का मोती
दादी का मोती
मोती एक शिकारी कुत्ता था। पतला-दुबला, लंबा, देखने में जरा भी खूबसूरत नहीं लगता था। पर उसकी आंखें बड़़ी थीं। हमेशा प्यार से चमकती रहती थीं। दादी को वह बहुत प्यार करता था। दादी भी उसे बहुत चाहती थीं।
दादी गांव में रहती थीं। परिवार बड़ा था। मकान भी बहुत बड़ा था और गांव में उन दिनों डाकू भी खूब आते थे। रात को अकसर कहीं न कहीं डाका पड़ ही जाता था। इसीलिए लोग कुत्ते पालते थे। शिकारी कुत्ता डाकुओं को देखते ही पहचान लेता था। फिर तो वह खतरनाक हो उठता था। उसके हमले से बचना कोई मामूली बात नहीं थी।
इसीलिए मोती की बहुत पूछ होती थी। वह सबका प्यारा था। वह घर के किसी आदमी पर कभी हमला नहीं करता था। प्यार इतना करता कि लोग परेशान हो जाते।
वह गांव, गंगा नदी से कुछ ही दूर था। कार्तिक के महीने में वहां बड़ा मेला लगता था। दादी हर साल उस मेले में हम सब बच्चों को भी लेकर जाती थीं। उनकी रखवाली के लिए मोती भी जाता था। बच्चों को वह खूब पहचानता था। उनका दोस्त जो बन गया था।
एक बार ऐसा हुआ कि मोती उस मेले में गायब हो गया। बहुत ढूंढ़ा, लेकिन कहीं पता नहीं लगा। किसी ने कहा कि उस पार चला गया है, उसने उसे नदी में घुसते देखा था। मेला खत्म हो गया, लेकिन मोती नहीं आया। हमने समझ लिया कि कोई उसे पकड़कर ले गया है या वह नदी में डूब गया है। सभी बहुत दुखी थे, लेकिन दादी के दुख की मत पूछो। रोत-रोते उनकी आंखें लाल हो गईं। सब लोग लौट आए। रुकते भी कब तक!
फिर बहुत दिन बीत गए। शायद तीन महीने बाद की बात है। जाड़े के दिन थे। अचानक आधी रात को दरवाजे पर खड़खड़ाहट शुरू हुई। हां, एक बात बताना तो मैं भूल ही गया था। मकान का दरवाजा बहुत बड़ा था और वह लकड़ी का नहीं था, टीन का था। इसलिए जरा सी भी आहट होती, तो बहुत शोर होता था। रात का सन्नाटा था। टीन के दरवाजे पर जो खड़खड़ाहट शुरू हुई, तो सब जाग उठे। समझ गए कि डाकू आ गए हैं।
सब डर गए, लेकिन यह क्या? खड़खड़ाहट हुए जा रही है, हुए जा रही है, रुकती ही नहीं। कभी कम, कभी तेज। डाकू तो ऐसा नहीं कर सकते। वे तो एकदम दरवाजा तोड़ देते हैं। कौन है यह? आदमी है, तो आवाज क्यों नहीं देता?

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तभी दादी एकदम चिल्ला पड़ीं, “मेरा मोती आया है।” सबने दादी की ओर देखा। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन भला मोती कहां से आता? वह दरवाजा कैसे खड़खड़ाएगा? लेकिन दादी ने तुरंत लालटेन उठाई और दरवाजा खोलने के लिए चल पड़ीं। उन्हें रोकना चाहा, लेकिन वह नहीं रुकीं। अब तो सबको ही पीछे-पीछे चलना पड़ा। भला, उन्हें अकेले कैसे जाने देते। अगर डाकू हुए तो!
बस आगे-आगे हाथ में लालटेन लिए दादी थीं और पीछे थे कोई पंद्रह-बीस औरतें और आदमी हाथों में लाठियां लिए हुए। एक-दो के पास छुरे भी थे। पर डर सब रहे थे। जैसे-जैसे दरवाजे के पास आ रहे थे, एक और आवाज उनके कानों में पड़ रही थी। वह मोती की आवाज थी। हां, हां, यह मोती ही है।
तभी किसी ने तेजी से आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया। सचमुच वह मोती था। दरवाजा खुलते ही वह तीर की तरह लपका और दादी से आ चिपटा। वह पागलों की तरह कभी इस कंधे पर झपटता, कभी उस कंधे पर चढ़ता, कभी मुंह चूमता और कभी अपना सिर उनकी गोद में रख देता। और दादी थीं कि रोए जा रही थीं। बोल रही थीं, “मेरा मोती, मेरा बेटा मोती, तू कहां गया था रे? मैं तुझे रोज याद करती थी और जानती थी कि तू एक दिन आएगा।”
मोती केवल दादी से ही नहीं मिला, वह घर के हर सदस्य के पास गया। उनके पास भी गया, जो अभी तक सोए पड़े थे। सबके साथ उसने वैसा ही प्यार दिखाया। वह रात कब बीती, कब सवेरा हुआ, किसी को पता नहीं चला। लेकिन यह बात सभी जानते हैं कि अगले दिन दादी ने देवी के मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के बाद सबको दो-दो पेड़े दिए थे। पूरे एक हफ्ते तक मोती की जो आवभगत हुई थी, उसकी चर्चा तो बच्चे बड़े हो जाने पर भी किया करते थे।
लेकिन यही मोती एक दिन पागल हो गया। गांव में डाकू आते थे, तो गीदड़ भी आते थे। मोती अकसर उन गीदड़ों को मार भगाता था। कभी-कभी गीदड़ भी उसे काट लेते थे। एक दिन उन गीदड़ों में शायद कोई पागल गीदड़ भी आ गया था। उसी ने मोती को काट लिया और मोती पागल हो गया। उसके मुंह से बराबर राल टपकने लगी। उसकी आंखों का रंग बदलने लगा, लेकिन उसका प्यार अब भी कम नहीं हुआ था। अब लोग उससे डरते थे। दादी भी डरती थीं, रोती थीं। जिसे वह इतना प्यार करती थीं, उसे अब गोद में नहीं ले सकती थीं। मोती ने अभी तक किसी को काटा नहीं था, लेकिन काट तो सकता था। पागल कुत्ते चुपचाप काट लेते हैं। भौंकते तक नहीं।
मोती ने किसी को काट लिया तो! पागल कुत्तों के काटने का उन दिनों कोई इलाज भी नहीं था। इसीलिए लोगों ने कहा, “मोती को मार डालो।” कैसी बुरी सलाह थी। दादी रोने लगीं। सब लोगों के दिल भर आए, लेकिन और कोई रास्ता भी तो नहीं था। मोती को मारना ही होगा।
फिर भी दो-तीन दिन बीत गए। इसी बीच में क्या हुआ कि घर का एक छोटा बच्चा अकेला सड़क पर निकल आया। वह धीरे-धीरे बाजार की ओर चल पड़ा। शाम का वक्त था। बैलगाड़ियां आ-जा रही थीं। अचानक एक गाड़ी के बैल भड़क उठे। वे तेजी से दौड़ने लगे। उनके ठीक सामने ही वह बच्चा चल रहा था। लोगों की निगाह उस पर पड़ी। वे चिल्लाए, “बच्चे को बचाओ, बच्चे को बचाओ।”
दौड़ते बैलों को रोकना आसान काम नहीं था। एकाएक कोई आदमी सामने नहीं आया। लेकिन मोती यह सब देख रहा था। वह तेजी से झपटा। पहले जब कभी ऐसा होता था, तो मुंह से कपड़ा पकड़कर खींच लेता था और बच्चे को सड़क से दूर ले जाता था, लेकिन अब तो वह पागल था। देखने वाले डर गए। कहीं उसके दांत बच्चे के बदन में गए तो।
लेकिन हुआ क्या? मोती तेजी से झपटा और उसने अपनी पीठ से धक्का देकर, बच्चे  को सड़क से बाहर धकेल दिया। उसे मुंह से नहीं पकड़ा।
लोगों ने यह सब देखा, तो अचरज से दांतों तले उंगली दबा ली। सब कहने लगे, “इतना समझदार कुत्ता! बीमार है, फिर भी बच्चे को बचा लिया।”
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चूहे और शेर की दोस्ती Stories For Kids In Hindi {*New Story*}
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Oleh

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